उदयपुर :- अनुसंधान निदेशालय, महाराणा प्रताप कृषि एवं
प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर में जैविक खेती पर राष्ट्रीय कृषि
विकास योजना एवं मुख्यमंत्री राजस्थान आर्थिक, परिवर्तन सलाहकार परिषद,
जयपुर के सहभागिता के तहत आयोजित एक दिवसीय राज्य स्तरीय कार्यशाला
प्रशिक्षण “टिकाऊ खेती एवं आजीविका हेतु जैविक खेती” मंगलवार, 28 दिसम्बर,
2021 को अनुसंधान निदेशालय में आयोजित किया गया।
इस कार्यशाला के
उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए डाॅ. नरेन्द्र सिंह
राठौड़ कुलपति, महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर
ने कहा कि केवल पेस्टीसाइड एवं उर्वरक के बिना खेती करना जैविक खेती नहीं
है। जैविक खेती कार्बन स्मार्ट खेती है। साथ ही यह मानव मूल्य स्मार्ट खेती
है।
जहाँ प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के साथ-साथ जल, कार्बन, ऊर्जा तथा पर्यावरण गुणवŸाा के सभी कारकों का अत्याधुनिक तकनीकों से प्रबंधन किया जाता है। हमें मिट्टी की गुणवŸाा बनाए रखने हेतु बिना नुकसान के 2050 तक 9-11 बिलियन जनंसख्या के लिए गुणवŸाापूर्ण खाद्यान्न उत्पादन करना है। इसके लिए नकारात्मक पहलुओं को हटाकर जैविक कृषि की सकारात्मक तकनीकों को जोड़ना होगा।
उन्होंने कहाँ कि भारतीय मृदाओं में 0.30-0.40 प्रतिशत जैविक
कार्बन ही बचा हैं जो मृदा स्वाथ्स्य के हिसाब से कम हैं। मिट्टी में
कार्बन का स्तर बढ़ाना, जल संरक्षण करना तथा जैव विविधता का संरक्षण करना आज
समय की आवश्यकता है। जैविक खेती इन सब समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करती
हैं अतः जैविक खेती के वैज्ञानिक ज्ञान से ज्यादा लोगों तक पहुँचने के लिए
कार्य करना चाहिए, साथ ही उन्होंने ने बताया कि कस्टुमाईज्ड, संतुलित,
एकीकृत, नैनो एवं जल घुलनशील उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए।
श्री
अर्जुन लाल चैधरी, उपनिदेशक (एटीसी) ने परंपरागत कृषि विकास योजना, जीरो
बजट नेचुरल फार्मिग एवं टिकाऊ खेती परियोजनाओं के माध्यम से मृदा में जैविक
कार्बन बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा हैं। साथ ही उन्होंने बताया कि जीवामृत
का प्रयोग करने से मृदा में सू़क्ष्म जीवों की मात्रा में वृ़िद्ध होती
हैं।
डाॅ. एस. के. शर्मा, अनुसंधान निदेशक ने कहा कि मानव स्वास्थ्य एवं
पर्यावरण संरक्षण के प्रति आम जागरूकता बढ़ने से जैविक उत्पादों की मांग बढ़
रही है। जैविक खेती के तहत क्षेत्रफल बढ़ाकर जैविक उत्पादन बढ़ाया जा सकता
है। इसके लिए किसानों को जागरूक होना आवश्यक है तथा जैविक कृषि की नवीनतम
तकनीकों का विकास करना आवश्यक है।
अतः देशज जैविक खेती की तकनीकों को आधुनिक जैविक खेती के रूप में ग्राहक एवं बाजार जोड़कर किसानों एवं पर्यावरण को फायदा पहुंचाना आज के समय की आवश्यकता है। हमें अग्निहोत्र कृषि, ऋषि कृषि, बायोडायनेमिक खेती, शून्य बजट, प्राकृतिक खेती तथा जैविक पशुपालन को वर्तमान कृषि पद्धति के साथ जोड़ना चाहिए।
डाॅ. आर. ए. कौशिक, प्रसार
शिक्षा निदेशक, डाॅ. मीनु श्रीवास्तव, अधिष्ठाता, कॉलेज ऑफ कम्युनिटी एंड
एप्लाइड साइंस, डाॅ. एन. के. जैन, अधिष्ठाता, कॉलेज ऑफ डेयरी एडं फुड साइंस
टेकनोलोजी, डाॅ. आर. के. जोशी, अधिष्ठाता, काॅलेज आफ वेटेनरी एंड एनिमल
साइंस, नवानिया, वल्लभनगर ने जैविक खेती एवं प्राकृतिक खेती पर अपने विचार
व्यक्त किए।
कार्यशाला के मुख्य बिन्दु इस प्रकार हैं :-
1. राजस्थान की जैविक कृषि की दृष्टि से डेटा बेस एवं मेपिंग आवश्यक हैं।
2. प्राकृतिक खेती के परिणामों का वैज्ञानिक मूल्यांकन हो।
3. प्राकृतिक खेती बिना तकनीकी प्रशिक्षण के पूर्ण नहीं हैं।
4. जैविक खेती एवं प्राकृतिक खेती खेत क्षेत्र आधारित एवं इसे सामान्य सिफारिश के आधार पर सभी जगह लागू करना मश्किल हैं।
इस कार्यक्रम में 50 राज्य सरकार, विश्वविद्यालय, पशुपालन विभाग, एनजीओ,
खाद्य विभाग, जयपुर, सीईईडब्ल्यू, नई दिल्ली के वैज्ञानिकों ने भाग लिया।